लागे दृष्टि तेरे श्रीपाद
पर,
तेरे आशीष तले मेरा सर।
और न दिल में कोई चाह रहे,
न ही दुनिया की कोई ख़बर॥
तू सिखा मुझे, प्यास भी जगा,
सब बटोरें ज्ञान, मुझे छोड़ना सिखा।
तू सर्वज्ञ है, तुझसे क्या छिपा,
जो मुझसे छिपा, वो रहस्य दिखा॥
कलि-संक्रमण का काल है,
और कलि अपने चरम पर।
थर-थर मैं भय से काँप रहा,
मैं शून्य हूँ, तू मुझे पूर्ण कर॥
शनिवार, २७/६/२०२६ , ७:०५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ
