राग जोगीया
विलंबित भक्ति-प्रधान बंदीश
स्थायी ( मुखड़ा)
मेरे विठ्ठल, मेरे पालनहार,
अठ्ठाइस युग भए तू खड़ा॥
आओ निकट, विश्राम करो अब,
थके चरणन को सहलाऊँ जरा॥
अंतरा १
भक्तन हित सब सुख बिसरायो,
न कछु खायो, न जल पायो॥
कुछ पल मोरी प्रीत स्वीकारो,
शयन करो प्रभु, आराम करो॥
अंतरा २
दुखिया जन की सुनत पुकारें,
निशदिन दौड़े द्वार-द्वारे॥
सबके आँसू अपने किए तू,
अपने नयन कब मूँदे बता॥
अंतरा ३
माता बनकर ममता बरसाई,
पिता बन जीवन राह दिखाई॥
सबको छाया देते देते,
धूप स्वयं कितनी सहि तू बता॥
अंतरा ४
तेरे चरणन की धूलि समेटूँ,
धीरे धीरे पग दबाऊँ॥
आज न माँगूँ मोक्ष न वैभव,
बस सेवा का अवसर दे जरा॥
समापन
सो जा विठ्ठल, आँखें मूँद ले,
भक्त खड़ा तेरे द्वारे् द्वारपाल बनके॥
सोये जग सारा तेरे कारण,
आज तुझे मैं पहरा दूँ जरा॥
बुधवार, २४/६/२६ , ११:०० AM
अजय सरदेसाई -मेघ
