स्थायी(मुखडा)
तू निरंजन, तू भवभय भंजन श्याम,
कर्म विमोचन, नैनन रंजन श्याम॥
अंतरा १ (विरहाची सुरुवात)
कब से आस लिये बैठा हूँ श्याम,
तेरी बाँसुरी के सुने बड़े बखान॥
श्रवण प्यासे तेरी मधुर तान को,
सुनाओ मोहन, दो मन को विश्राम॥
अंतरा २ (विरहाची तीव्रता)
विरह अगन जलत उर भीतर,
सुमिरत नाम सुबह औ शाम॥
दीनन के तुम पालनहारे,
काहे मोहि तरसावत श्याम॥
अंतरा ३ (कृपेची याचना)
कलि-कलेस सों राखो मोहे,
हरो मनोमल, दीजो विश्राम॥
दीन दयाल कृपा निधान तुम,
राखो लाज अब मोरी श्याम॥
अंतरा ४ (पूर्ण शरणागती – चरमबिंदू)
चरणन लागी अरज हमारी,
'मेघ' कहे, दिजो दरस घनश्याम॥
समारोप (स्तयी पुनरागमन)
तू निरंजन, तू भवभय भंजन श्याम,
कर्म विमोचन, नैनन रंजन श्याम॥
गुरुवार, २५/६/२६ , ११:३० AM
अजय सरदेसाई -मेघ

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