स्थायी मुखडा
तुम बिन जियरा नाहिं लागत सखी,
आवौ अब मोरे आँगन सखी॥
अंतरा १
बहुत बखत भयो, नैना बाट निहारैं,
प्रीत लगाइ, मोहि बिसरायौ काहे सखी॥
अंतरा २
मोहि न आवत रास रचावन,
मैं नाहिं कान्हा बंसी बजावन,
तूहुँ कहाँ राधा, री सखी॥
अंतरा ३
प्रीत न पूछै कान्हा-राधा,
प्रीत न देखै भेद सखी॥
अंतरा ४
एक बेर जो उर माँहि बसै,
जनम भर छूटै न सखी॥
गुरुवार, २५/६/२६ , ३:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ

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