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Wednesday, 26 August 2026

"एकचि हृदय"



एका सदगुरू वाचून नाही तरणोपाय,

परी सदगुरू शोधण्यास काय उपाय?


सदगुरू कोणता करावा,तो कसा असावा,

ज्यात नाही षडरिपू, गुरु तसा असावा.


शिष्य वृत्ती कोणती, शिष्य कसा असावा?

जयाची गुरुचरणीच वृत्ती, शिष्य तसा असावा.


गुरु तोची जो शिष्याचे काही घेत नाही,

शिष्य ऐसा जो सर्व गुरुसच समर्पुन राही.


ह्यात द्वंद्व दिसले,परी ते फक्त बाह्य आहे,

चक्षूंस दिसले दोन तरी हृदय एकच आहे.


बुधवार , २६/८/२६ , ९:०० PM

अजय सरदेसाई -मेघ

Sunday, 23 August 2026

॥ सप्तश्लोकी आदित्यस्तोत्रम् ॥




॥ १ ॥
सर्वदेवानां तेजस्त्वं, देवानां प्रतिनिधिः ।
भूतानां जीवनाधारं, भास्करं प्रणमाम्यहम् ॥

॥ २ ॥
सृजसि पासि पोषयसि, विश्वमेतच्चराचरम् ।
त्वया विना न जीवन्ति, प्राणिनो भुवि केचन ॥

॥ ३ ॥
द्वादशादित्यरूपेण, द्वादशधा प्रकाशसे ।
मित्रो रविश्च सूर्यश्च, भानुर्भास्कर एव च ॥

॥ ४ ॥
खगः पूषा हिरण्यगर्भो, मरीचिरादित्य एव च ।
सविता चार्कश्च, द्वादशैते नमोऽस्तु ते ॥

॥ ५ ॥
एतैः स्वरूपभेदैस्त्वं, विश्वं नित्यं प्रकाशसे ।
भक्त्या त्वां प्रणमाम्यद्य, कुरु मे सततं शुभम् ॥

॥ ६ ॥
संकटेषु जयं देहि, आयुरानन्दकीर्तिद ।
सार्वभौम महादेव, सिद्धिं देहि क्षणादपि ॥

॥ ७ ॥
विजयं च सुखं कीर्तिं, ददासि भक्तवत्सल ।
त्रिवारं प्रणमामि त्वां, भास्करं विश्वनायकम् ॥

॥ फलश्रुतिः ॥
सप्तश्लोकमिदं तेजस्वि, स्तोत्रं यः पठेन्नरः ।
एकविंशतिवारं तु, तस्य कार्याणि सिद्ध्यन्ति ॥
सनर्वकार्येषु सिद्धिं च, सर्वमङ्गलमाप्नुयात् ।

।। ॐ सूर्यनारायणायेदमर्पणमस्तु ॥

रविवार, २३/८/२६ , १२:३० PM
अजय सरदेसाई -मेघ 

Friday, 21 August 2026

मैं नाहीं तोसे बोलत श्याम ।


जाओ, मैं नाहीं तोसे बोलत श्याम,

तू कुछ भी कहे या मोहे समझाए श्याम।


रोज़-रोज़ छेड़त, रोज़ करत हो नटखट,

मानूं ना मानूं ना, चाहे रूठ जाए श्याम।


गोपिन के आगे तू करत ठिठोली,

मोहे अकेली छोड़ के, तू कहाँ जाए श्याम।


नैनन में आँसू पर मुख पे है रुसवाई,

मन तो पुकारे तोहे, फिर भी मैं न बुलाऊँ श्याम।


अब खुशी दे या दे तू ग़म, राधा तेरी ही रहेगी,

जितना भी रूठूं मैं, तुझ बिन कहाँ चैन मोहे श्याम।


शुक्रवार, २१/८/२६ , ५:३० PM

अजय सरदेसाई -मेघ

सभी नाम उसी के




कोई कृष्ण कृष्ण बोले, कोई गोविंद गोविंद बोले,
कृष्ण कहो या गोविंद कहो, सुख दोनों में मिले॥

कोई श्याम श्याम ध्यावे, कोई हरि हरि गावे,
जिस नाम में मन रम जाए, आनंद उसी में मिले॥

कोई मुरलीधर को पुकारे, कोई नंदलाला बोले,
नाम भले ही हों दो प्यारे, प्रेम वही मन खोले॥

कोई गिरिधर गिरिधर गाए, कोई बांके बिहारी बोले,
कोई माधव मन में ध्यावे, हर नाम में हरि ही खिले॥

मंदिर मंदिर एक ही मूरत, हर भक्त का मन डोले,
भाषा चाहे जो भी हो, प्रभु सबकी पीड़ा तोले॥

सभी नाम उसी के हैं, सभी में एक ही सुख घोले,
जिसकी जो हो चाह, वह हरि को उसी नाम से बोले॥

कृष्ण, श्याम, माधव, गिरधर, जो चाहे नाम ले ले,
सभी नाम उसी के हैं ये, कर सुमिरन, पाप धो ले॥

कोई कृष्ण कृष्ण बोले, कोई गोविंद गोविंद बोले,
कृष्ण कहो या गोविंद कहो, सुख दोनों में मिले॥

— अजय सरदेसाई "मेघ"
शुक्रवार, २१/८/२०२६

Wednesday, 19 August 2026

श्री कृष्ण रास लिला




वृंदावन माँ हरित वन मच्यो शोर,
गोपियन संग रमत रास नंद किशोर।
हर गोपी संग एक एक कन्हा नाचे,
ई का जादू चलाई तूने चितचोर।

सूर असूर सबही स्वर्ग पाताल से आए,
देखन प्रभु की लीला, बहैं अखियन नीर।
सुन बखान ब्रह्मा सृष्टिकर्ता देखन माखनचोर,
शंकर विष्णु गोपियन भेस माँ, नाचैं जमुना छोर।

रैन ढले पर रास न थाके, बाजे मुरली मोर,
कान्ह हँसे, गोपी लजाएं, नाचे यमुना छोर।
"मेघ" कहे यह लीला अमर, जुग जुग रहे हुलोर,
मन बसिए ई अमृत पिने, बन जाऊं मैं भी चकोर।

बुधवार, १९/८/२०२६ , १२:१५ PM
अजय सरदेसाई -मेघ

Tuesday, 18 August 2026

बन्सी सुना रे तोरी कान्हा ।


चाहे मोहे गोपियन ही बना तू कान्हा,
पर मोहे बंसी सुना रे तोरी कान्हा।

मन मोर रंग्यो रे भक्ती रंगी,
मोहे तोहे प्रेम रंग रंगा, मोरे कान्हा।
बहुत जन्मो से मैं तोरी बाट देख खड़ा हूं,
कब होगा इश और भक्त मिलन रे कान्हा।

चाहे मोहे गोपियन ही बना तू कान्हा,
पर मोहे बंसी सुना रे तोरी कान्हा।

बीते जुग नजाने कितने, अखियाँ थकी रे,
अब तो चले आओ द्वार, मोरे कान्हा।
तन मन अरपन कर दिया तोरे चरणन में,
अब कोई और चाह नहीं मोहे कान्हा।

चाहे मोहे गोपियन ही बना तू कान्हा,
पर मोहे बंसी सुना रे तोरी कान्हा।

प्रेम की डोर से बांध लिया तूने मोहे,
अब तो मैं तोरा, तू ही मोरा, कान्हा।
आ जा अब आंगन मोरे, बांसुरी बजा,
पूरण कर दे जन्मो की आस, मोरे कान्हा।

चाहे मोहे गोपियन ही बना तू कान्हा,
पर मोहे बंसी सुना रे तोरी कान्हा।

मंगलवार, १८/८/२६ , ३:०० PM
अजय सरदेसाई -मेघ